Thursday, 30 August 2012

ऐसा तेरा प्यार सखी री


ऐसा तेरा प्यार सखी री, ऐसा तेरा प्यार

 

जैसे शीतलता चन्दन की

                  अरू चंद्रिका धवल चंद्र की

भर दे तन-मन में उजियारा

                  जिसकी किरण हज़ार |

ऐसा तेरा प्यार ......

 

 

पंछी उड़ता नील गगन में

                  सारे जग की पीड़ा मन में

पर पीड़ित का मन बहलाने

                  गाए गीत मल्हार |

ऐसा तेरा प्यार ......

 

 

अपने मृदु अंचल में ढक कर

                  धरती के जलते अधरों पर

चुम्बन दे स्पंदित करती

                  सावन की मस्त फुहार |

ऐसा तेरा प्यार ......                            

 

यह जग है इस मन का दर्पण

                  अपना आप देखता है मन

औरों के पावन कर्मों में

                  खोजे कलुष विकार |

ऐसा तेरा प्यार ......

           

जग ने किसको गले लगाया

                  जनक-सुता को भी ठुकराया

जब तक धरती फट ना जाए

            खड़ी रहे हर सीता लाचार |

ऐसा तेरा प्यार ......

दीप जलाओ


तुफानो में दीप जलाओ

            हृदय स्नेह का तेल

            बने समता की बाती

            जले कर्म की लौ

            ज्ञान-दीवे की माटी

 

अंधे जग का तिमिर मिटाओ

तूफानों में दीप जलाओ

           

            झंझावात चले जाति का

            सम्प्रदाय की आंधी आए

            चक्रवात हो भाषा के

            मजहब का तम तामस छा जाए

 

बुझे न लौ ऐसी सुलगाओ

तूफानों में दीप जलाओ

           

            जर्जर जंग लगा जड़ जीवन

            आहत क्षत विक्षत हर यौवन

            दीप्तिवान हो उठे प्राण

            अब जले जोत चेतन जन मन

 

मृत्यु में जीवन सरसाओ

तूफानों में दीप जलाओ

जा रहा आदमी...


निचुड़ चुका रक्त सभी आदमी की देह का

सूख गया सोत सब मन में बसे नेह का

फिर भी क्या बचा जिसे बचा रह है आदमी

जाने किस मुकाम पे ये जा रहा है आदमी |

 

आदमी की भूख बिक रही सरे बाजार में

बेबसी की गंध है हर प्यार के इकरार में

हाथ में ज़हर का जाम और है खबर उसे

फिर भी बेखबर से पिये जा रहा है आदमी |

 

मखमली गद्दों पे देखो आदमी बेचैन है

करवटों पे करवटें और नींद से महरूम है

फावड़ा जिसने चलाया दिन की तपती धूप में

मस्त टूटे झोंपड़े में सो रहा है आदमी |

 

छीनकर कितने उजाले शाह अँधेरे दिये

जहर बुझे तीरों से कितने खुदा जख्मी किये

है बहाया खून सच्चाई का हर इक जन्म में

पाप के धब्बों को अब तक धो रहा है आदमी |

 

हर किसी को जुस्तजू है, चैन की आराम की

एक पल उजली सुबह की, एक रंगीनी शाम की

उम्र भर दौड़ा फिरा है हाथ में जिंदगी लिये

ज़िंदगी न पा सका है ज़िंदगी भर आदमी |

केवल प्यार है


गिर रहा जो बादलों से बूंद बन, झर रहा जो कमल पर बन ओस कण

ये जमाना जो कहे कुछ भी कहे, मैं कहता हूँ प्यार केवल प्यार है |

 

                  कली चटक कर फूल जब बन जाती है

                  रंग बिरंगी तितलियाँ मंडराती हैं

                  लता वृक्ष पर आप ही चढ़ जाती है

                  और गिलहरी टहनी पर बल खाती है

पत्ता-पत्ता बाग का कुछ भी कहे

मैं कहता हूँ प्यार केवल प्यार है |

           

                  उमड़-घुमड़ कर ये सावन जब आता है

                  मस्त मयूर तब नर्तक क्यूँ बन जाता है

                  कोकिल भी तब सात सुरों में गाती है

                  चकवे को चकवी की याद सताती है

सारे पंछी जो कहें कुछ भी कहें

मैं कहता हूँ प्यार केवल प्यार है |

                 

                  ये गगन क्यूँ दूर धरा से मिलता है

                  और चंदा क्यूँ चांदनी को छलता है

                  क्यूँ सरिता सागर से जाकर मिलती है

                  क्यूँ पवन पिया के लिए मचलती है

ये गगन और ये पवन कुछ भी कहें

मैं कहता हूँ प्यार केवल प्यार है |

 

                  पल पल सृष्टि कैसे विकसित हो रही

                  प्रलय सृजन से क्यूँ पराजित हो रही

                  जग मिट-मिट कर सुन्दर और बनता जाता है

                  राज़ क्या है कौन इसे कह पाता है

कह सके या कोई इसको ना कहे

मैं कहता हूँ प्यार केवल प्यार है |